अप्रैल डायरी
जिंदगी की आखिरी शाम तुम रहोगे मेरे साथ? रहोगे न! हां यही मेरी इच्छा है। मेरे इतना कहते ही तुम कितना तेज हंसे थे, और हंसते हुए ही कहे कि "उहूं जाऊंगा तो मैं ही पहले, तुम रहना साथ मेरे।" बहस के दौरान फिर हमने सोचा मरेंगे एक साथ ,एक दूसरे के हाथों में हाथ लिए। सच कितनी सुखद अनुभूति थी हमारे मन में। पर क्या ऐसा सम्भव है? रोज किसी न किसी की मौत हम अपनी आंखों से देख रहे हैं। वो भी तो किसी अपनों की ही है । असहनीय वेदना मन में भर जाता है। कभी कभी सोचती हूँ अगर हममें से कोई एक इस दुनिया से चला जायेगा तो दूसरे के पास जीने की इच्छा क्या रह पायेगी? पर चाहने और ना चाहने से क्या कुछ मिल जाता है, नहीं न! फिर चाहत क्यों बार बार मन में उठने लगता है और मन ही है कि इस चाहत को हकीकत समझ लेता है। मन पर कोई अंकुश नहीं होता और यही अंकुश न होने की वजह से जब मनमुताबिक कुछ नहीं होता तो मन उदासियों के भंवर में डुब जाता है और लगता है जीवन जीने लायक नहीं है। कई बार तो मन होता है जीवन लीला ही खत्म कर ले अपना। वक्त गुजरते जाता है और मन पर जैसे कोई है जो मरहम लगाते जाता है, जख्म भरने लगता है ।प...