डायरी

तेरी हाथों की लकीरों में मेरी भी लकीर समायी हुई है
हाँ मैंने देखा है और महसूस किया है। कुछ तो होता होगा न ,आखिर क्यों और कैसे दो अजनबी एक हो जाते हैं?

मुझे याद है  तुम्हारे मैसेज का जवाब मैं बहुत कम देती थी,क्योंकि तब मैं तुम्हें जानती ही कितना थी।
एक दिन पता नहीं क्या और कुछ हुआ और हम खूब ढ़ेर सारी बातें करते रहे। बातों के दरम्यान तुम्हारा एक मैसेज मुझे सोचने पर मजबूर कर दिया की क्या वाकई मेरी चाहत भी तुम हो?
दो दिन सोचती रही और अचानक रात दस बजे के करीब मैंने भी तो हौले से स्वीकार किया कि हाँ है न मुझे भी प्यार तुमसे।
क्षण भर तुम आश्चर्य चकित हुए। विश्वास और अविश्वास के बीच तुम गहरी सांस लेते रहे और फिर धीरे से कहा, "बाद में बात करें?"
खुशी के पल ,जिसमें शायद हम कुछ देर अकेले रहना चाहते हैं, उससे भी जिसके कारण हम खुश हैं। 
बातें थमने का नाम नहीं ले रही थी, कई रातें हमने जागते हुए गुजारे और तब हमने मिलने का मन बनाया।
हम मिले ।तुम घबराये हुए थे और मैं बिल्कुल सहज,जैसे सदियों से हमारी पहचान हो।
तुम्हारी घबराहट का राज जानकर मुझे बहुत हँसी आई। तुम सोचकर परेशान थे कि मैं तुम्हे एक्सेप्ट नहीं करूँगी। क्या तुम्हें पता नहीं की प्यार करने वाले ना उम्र देखते ,ना सुंदरता और ना ही जाति बंधन,प्यार तो बस हो जाता है ।

तुम्हारी नजरें नीचे थी और मेरी तुम्हारे चेहरे पर। सहज हुए तुम कुछ देर बाद और फिर तो हमने कितने सारा वादा कर डाले। कभी न बिछड़ने की और हमेशा एक दूसरे की भावनाओं और विश्वास का ख्याल रखने की।
मेरे लिए वो क्षण बहुत पवित्र था। आत्मीयता की लीन क्षणों में हमने एक दूसरे को बहुत नजदीक महसूस किया।और इतने सालों के बाद भी हम उसी प्यार में जी रहे जैसे शुरू के दिनों में था।
ईश्वर ने उपहार स्वरूप तुम्हें मुझे दिया है ,ईश्वर न करे कि हम कभी अलग हो। हमेशा साथ साथ रहने की कामना के साथ बहुत सारा प्यार। ।

#मार्च_डायरी

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