कभी ऐसा हो कि तुम्हें लिखूं कुछ

कभी ऐसा हो कि तुम्हे लिखूँ कुछ...
तो ख्याल रखना
उसे कभी हड़बड़ाहट में मत पढ़ना,
उसे समझना छुट्टी वाला दिन
और आराम से लेटे रहना!

जो लिखा है उसे देखना
फ़ुर्सत वाली चाय समझकर
मुस्करा देना उसे महसूस कर 
और हौले से सम्भाल लेना!

अपने हाथों में 
कप को थामते हो जैसे,
उन अक्षरों को भी थाम लेना
चाय की मिठास और 
अदरक की महक सा
उन शब्दों को महसूस कर लेना!

अपनी छोटी छोटी आँखों को
चाहे थोड़ा बन्द रखना
पर जब भीगें ये पलकें
तो हौले से मुस्कुरा देना!

जब खत्म हो जाएं शब्द तो 
जवाब मत देना...
अपने कंधे को टिका कर दीवार पर
आँखों को बन्द कर लेना।

आँखों को बन्द रखना 
उन्हें हड़बड़ाहट में मत खोलना!
मुश्किल से होगा 
पर कभी ऐसा हो कि
लिख पाऊं कुछ 
तो ध्यान रखना
उसे हड़बड़ाहट में मत पढ़ना!!

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